श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  10.84.12 
नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारका
न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्‍मन: ।
उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं
विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
न देवता अग्नि को नियंत्रित करने वाले हो, सूर्य या चंद्रमा के अधिष्ठाता हो, न ही पृथ्वी, सितारों, जल, आकाश, वायु, वाणी और मन के नियंत्रक हो, इन देवताओं की उपासना करने वाले अपने पापों से मुक्त नहीं हो पाते हैं, क्योंकि वे द्वैत के दृष्टिकोण से देखते हैं। लेकिन ज्ञानी ऋषि थोड़ी देर के लिए भी आदरपूर्वक सेवा करने पर व्यक्ति के पापों को नष्ट कर देते हैं।
 
Neither the presiding deities of fire, the Sun and the Moon, nor the presiding deities of earth, stars, water, sky, wind, speech and mind can destroy the sins of their worshippers who are accustomed to seeing from the viewpoint of duality. But wise sages, if served with respect even for a few moments, destroy the sins of a man.
तात्पर्य
सर्वोच्च भगवान के एक अपरिपक्व भक्त भगवान की मूर्ति को ही ईश्वरीय स्वीकार कर सकते हैं और अन्य सभी चीजों को भौतिक रूप मान सकते हैं - यहाँ तक ​​कि भगवान के गोपनीय सेवक भी। फिर भी, क्योंकि वह भगवान विष्णु की सर्वोच्च स्थिति को पहचानते हैं, ऐसे भक्त भौतिकवादी देवताओं के उपासकों से बेहतर स्थिति में हैं, और इस प्रकार वह कुछ सम्मान के पात्र हैं।

इस पद में, जो व्यक्ति भक्तिमय जीवन के निम्नतम चरणों से आगे बढ़ना चाहता है, उसके लिए उन्नत ऋषियों के साथ सीधे या उनके निर्देशों को सुनकर संघ करने की सिफारिश की जाती है। एक नए भक्त को निर्दोष जीवों और अपने शरीर और मन के खिलाफ हिंसा के अधिक स्पष्ट पापों से मुक्त किया जा सकता है, लेकिन जब तक वह भक्ति पथ पर बहुत उन्नत नहीं हो जाता, तब तक उसे हमेशा झूठे अभिमान, सम्मानीय वैष्णवों के प्रति अनादर और दुखी जीवों के लिए करुणा की कमी के सूक्ष्म संदूषणों से जूझना होगा। अपरिपक्वता के इन लक्षणों के लिए सबसे अच्छा उपाय है शुद्ध वैष्णवों से सुनना और उनका सम्मान करना और गिरी हुई, वातानुकूलित आत्माओं को वितरित करने के लिए काम करने में उनकी सहायता करना।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)