दूसरी ओर, व्यासदेव, नारद और चार कुमारों जैसे महान वैष्णव संत हमेशा कृष्ण भावना में लीन रहते हैं, और इस प्रकार वे वास्तविक चलती-फिरती तीर्थ स्थल हैं। उनके साथ एक पल का भी संग, विशेष रूप से प्रभु का महिमामंडन सुनकर, किसी को भी सभी भौतिक उलझनों से मुक्त कर सकता है। जैसा कि राजा युधिष्ठिर ने विदुर से कहा था,
भवद्-विधा भागवता:
तीर्थ-भूताः स्वयं विभो
तीर्था-कुर्वन्ति तीर्थानि
स्वान्तः-स्थेन गदाभृतः
"हे भगवान, आप जैसे भक्त वास्तव में पवित्र स्थान हैं। क्योंकि आप अपने हृदय में भगवान को धारण करते हैं, आप सभी स्थानों को तीर्थ स्थानों में बदल देते हैं।" (भाग। 1.13.10)
