श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  10.84.11 
न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामया: ।
ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधव: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
जलवाले स्थान ही असली पवित्र तीर्थस्थल नहीं होते, मिट्टी और पत्थर की कोरी मूर्तियाँ भी सच्चे आराध्य देवता नहीं हैं। ये सब दीर्घकाल के बाद ही किसी को पवित्र कर पाते हैं, परंतु संत प्रवृत्ति वाले मुनिजन दर्शन मात्र से ही पवित्र कर देते हैं।
 
Only water filled places are not the real holy pilgrimage places, nor are the idols made of clay and stone the real deities. These can purify someone only after a long time, but the sages with saintly nature purify them just by seeing them.
तात्पर्य
क्योंकि ईश्वर का व्यक्तित्व पूर्ण है - परम आत्मा - उसका कोई भी प्रतिनिधित्व, चाहे पत्थर, चित्र, ध्वनि या किसी अन्य अधिकृत माध्यम में प्रकट हो, उसके गो लोक वृंदावन के शीर्ष आध्यात्मिक ग्रह पर उसके मूल रूप से भिन्न नहीं है। लेकिन सामान्य देवता परम नहीं होते हैं, वे असीम आत्माएँ होती हैं, और इस प्रकार देवताओं का प्रतिनिधित्व उनके साथ समान नहीं होता है। परमेश्वर में पारलौकिक विश्वास की कमी रखने वालों के लिए देवताओं की पूजा या किसी पवित्र स्थान पर धार्मिक स्नान सीमित लाभ ही देता है।

दूसरी ओर, व्यासदेव, नारद और चार कुमारों जैसे महान वैष्णव संत हमेशा कृष्ण भावना में लीन रहते हैं, और इस प्रकार वे वास्तविक चलती-फिरती तीर्थ स्थल हैं। उनके साथ एक पल का भी संग, विशेष रूप से प्रभु का महिमामंडन सुनकर, किसी को भी सभी भौतिक उलझनों से मुक्त कर सकता है। जैसा कि राजा युधिष्ठिर ने विदुर से कहा था,

भवद्-विधा भागवता:

तीर्थ-भूताः स्वयं विभो

तीर्था-कुर्वन्ति तीर्थानि

स्वान्तः-स्थेन गदाभृतः

"हे भगवान, आप जैसे भक्त वास्तव में पवित्र स्थान हैं। क्योंकि आप अपने हृदय में भगवान को धारण करते हैं, आप सभी स्थानों को तीर्थ स्थानों में बदल देते हैं।" (भाग। 1.13.10)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)