श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 83: कृष्ण की रानियों से द्रौपदी की भेंट  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  10.83.33 
दारुकश्चोदयामास काञ्चनोपस्करं रथम् ।
मिषतां भूभुजां राज्ञि मृगाणां मृगराडिव ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
हे राज्ञि! सारथी दारुकू ने भगवान् के सोने से सजे रथ को राजाओं के सामने इस प्रकार हाँका कि वे छोटे-छोटे पशुओं की तरह विवश होकर सिंह को देखते रह गए।
 
हे राज्ञि! सारथी दारुकू ने भगवान् के सोने से सजे रथ को राजाओं के सामने इस प्रकार हाँका कि वे छोटे-छोटे पशुओं की तरह विवश होकर सिंह को देखते रह गए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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