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श्लोक 10.83.33  |
दारुकश्चोदयामास काञ्चनोपस्करं रथम् ।
मिषतां भूभुजां राज्ञि मृगाणां मृगराडिव ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राज्ञि! सारथी दारुकू ने भगवान् के सोने से सजे रथ को राजाओं के सामने इस प्रकार हाँका कि वे छोटे-छोटे पशुओं की तरह विवश होकर सिंह को देखते रह गए। |
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| हे राज्ञि! सारथी दारुकू ने भगवान् के सोने से सजे रथ को राजाओं के सामने इस प्रकार हाँका कि वे छोटे-छोटे पशुओं की तरह विवश होकर सिंह को देखते रह गए। |
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