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श्लोक 10.83.28  |
तद् रङ्गमाविशमहं कलनूपुराभ्यां
पद्भ्यां प्रगृह्य कनकोज्ज्वलरत्नमालाम् ।
नूत्ने निवीय परिधाय च कौशिकाग्र्ये
सव्रीडहासवदना कवरीधृतस्रक् ॥ २८ ॥ |
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| अनुवाद |
| इतने में ही मैं रंगशाला में पहुँच गई। मेरे पाँवों के नुपूर मन्द ध्वनि कर रहे थे। मैंने उत्तम कोटि के रेशम के नये वस्त्र धारण किये हुए थे, जिसके उपर करधनी बंधी हुई थी और मैंने सोने तथा रत्नों से बना चमकीला हार पहना हुआ था। मेरे मुख पर लजीली मुसकान थी और मेरे बालों में फूलों की माला सुशोभित थी। |
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| इतने में ही मैं रंगशाला में पहुँच गई। मेरे पाँवों के नुपूर मन्द ध्वनि कर रहे थे। मैंने उत्तम कोटि के रेशम के नये वस्त्र धारण किये हुए थे, जिसके उपर करधनी बंधी हुई थी और मैंने सोने तथा रत्नों से बना चमकीला हार पहना हुआ था। मेरे मुख पर लजीली मुसकान थी और मेरे बालों में फूलों की माला सुशोभित थी। |
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