तद् रङ्गमाविशमहं कलनूपुराभ्यां
पद्भ्यां प्रगृह्य कनकोज्ज्वलरत्नमालाम् ।
नूत्ने निवीय परिधाय च कौशिकाग्र्ये
सव्रीडहासवदना कवरीधृतस्रक् ॥ २८ ॥
अनुवाद
इतने में ही मैं रंगशाला में पहुँच गई। मेरे पाँवों के नुपूर मन्द ध्वनि कर रहे थे। मैंने उत्तम कोटि के रेशम के नये वस्त्र धारण किये हुए थे, जिसके उपर करधनी बंधी हुई थी और मैंने सोने तथा रत्नों से बना चमकीला हार पहना हुआ था। मेरे मुख पर लजीली मुसकान थी और मेरे बालों में फूलों की माला सुशोभित थी।
Then I entered the theatre. The anklets on my feet were making a soft sound. I was wearing new clothes of the finest quality silk, with a girdle over them and I was wearing a dazzling necklace made of gold and gems. There was a shy smile on my face and a garland of flowers in my hair.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी बताते हैं कि श्री लक्षमणा भगवान को प्राप्त करने के तरीके को याद करके इतनी उत्साहित थीं कि वह अपनी शर्म भूल गईं और उन्होंने अपनी जीत का वर्णन किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥