निष्काम भक्त सांसारिक उन्नति या आध्यात्मिक मुक्ति की इच्छा से कभी प्रेरित नहीं होते। और भले ही भगवान उन्हें ऐसे आशीर्वाद प्रदान करें, भक्त अक्सर उन्हें स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (11.20.34) के ग्यारहवें सर्ग में भगवान कृष्ण ने कहा है:
ना किचित साधवो धीरा
भक्ता ह्य एकांतिनो मम
वांछंत्य अपि मया दत्तम
कैवल्यम् अपुनर्-भवम्
"क्योंकि मेरे भक्त संत प्रवृत्ति के होते हैं और गहन बुद्धि वाले होते हैं, अतः वे स्वयं को पूर्णतः मेरे प्रति समर्पित कर देते हैं और मेरे अलावा कुछ भी नहीं चाहते। वास्तव में, भले ही मैं उन्हें जन्म और मृत्यु से मुक्ति प्रदान करूं, फिर भी वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं।" इसलिए, यह उचित है कि गोपियाँ भगवान कृष्ण के उन्हें ज्ञान-योग सिखाने के प्रयास पर हल्के से ईर्ष्यालु स्वर में प्रतिक्रिया करती हैं।
इस प्रकार, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, इस श्लोक में गोपियाँ जो शब्द बोलती हैं, उनकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है: "हे सूर्य जो अज्ञानता के अंधकार को सीधे नष्ट कर देते हैं, हम इस दार्शनिक ज्ञान की सूर्य किरणों से झुलस गए हैं। हम चकोर पक्षी हैं जो केवल आपके सुंदर चेहरे से निकलने वाली चांदनी पर निर्वाह कर सकते हैं। कृपा करके हमारे साथ वृंदावन वापस आइए और इस तरह हमें वापस जीवन में लाएँ।"
और अगर वे कहते हैं, "तो द्वारका आओ न; वहाँ हम एक साथ आनंद लेंगे, " वे उत्तर देती हैं कि श्री वृंदावन उनका घर है, और वे उससे इतना जुड़ी हुई हैं कि वे कहीं और निवास करने के लिए नहीं जा सकतीं। गोपियों का तात्पर्य है कि वहीँ, कृष्ण उन्हें अपनी पगड़ी में मोर पंख पहनकर और अपनी बाँसुरी से मोहक संगीत बजाकर आकर्षित कर सकते हैं। केवल वृंदावन में फिर से प्रकट होकर ही गोपियाँ बचाई जा सकती हैं, न कि उस पर किसी अन्य प्रकार के ध्यान या आत्म के सैद्धांतिक ज्ञान से।
