श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 82: वृन्दावनवासियों से कृष्ण तथा बलराम की भेंट  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  10.82.48 
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं
योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधै: ।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं
गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा न: ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
गोपियों ने कहा कि: हे कमलनाभ प्रभु, आपके चरणकमल उन प्राणियों के लिए एकमात्र सहारा हैं, जो भौतिक संसार रूपी गहरे कुएं में गिर गए हैं। आपके चरणकमलों की पूजा और ध्यान बड़े-बड़े योगी और उच्च विद्वान दार्शनिक करते हैं। हमारी इच्छा है कि हमारी भीतरी आत्म-जागरूकता में भी ये चरणकमल दिखें, यद्यपि हम साधारण प्राणी हैं, जो घर की जिम्मेदारियों में उलझे रहते हैं।
 
The gopis spoke thus: O Lord Kamalnabh, Your feet are the only refuge for those who have fallen into the deep well of the material world. Great yogis and great philosophers worship and meditate on Your feet. We only desire that these feet should rise within our hearts, although we are all ordinary beings engaged in household chores.
तात्पर्य
श्रील प्रभुपाद के श्री चैतन्य-चरितामृत (मध्य 1.81) के अंग्रेजी अनुवाद से इस श्लोक का अनुवाद और शब्दार्थ लिए गए हैं। इस श्लोक को उद्धृत किया गया है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के द्वारा ईर्ष्यालु भाव को प्रकट करते हुए गोपियों ने ये कपटपूर्ण आदरमूलक शब्द बोले हैं। उनके कथनों को इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है। " हे प्रभु, हे साक्षात् प्रकट हुए परमात्मा, हे निश्चित ज्ञान के शिक्षकों में श्रेष्ठ रत्न आप हमारे घर, संपत्ति और परिवार के प्रति अत्यधिक आसक्ति से अवगत थे। इसलिए, आपने पूर्व में ही उद्धव को हमें उस ज्ञान में निर्देश देने के लिए भेजा था जो अज्ञानता को दूर कर देता है, और अब आपने खुद भी ऐसा ही किया है। इस प्रकार, आपने हमारे हृदयों को दोषों से शुद्ध कर दिया है, और परिणामस्वरूप हम आपके शुद्ध प्रेम को समझते हैं, जो हमें मुक्ति दिलाने के अलावा किसी अन्य उद्देश्य से रहित है। लेकिन हम केवल मूर्ख ग्वालनें हैं। यह ज्ञान हमारे दिलों में कैसे बना रहेगा? हम आपके चरणों पर भी निरंतर ध्यान नहीं कर सकते हैं, जो भगवान ब्रह्मा जैसी महान आत्माओं के लिए साक्षात्कार का केंद्र हैं। कृपया हम पर कृपा करें और किसी तरह हमारे लिए आप पर ध्यान केंद्रित करना संभव बनाएं, भले ही थोड़ा ही क्यों न हो। हम अभी भी अपने कर्मफलों के परिणामों को भुगत रहे हैं, तो हम आप पर, महान योगियों के लक्ष्य पर ध्यान कैसे लगा सकते हैं? ऐसे योगी अपरंपार रूप से बुद्धिमान होते हैं, लेकिन हम केवल कमजोर दिमाग वाली महिलाएं हैं। कृपया हमें भौतिक जीवन के इस गहरे कुएं से निकालने के लिए कुछ करें। "

निष्काम भक्त सांसारिक उन्नति या आध्यात्मिक मुक्ति की इच्छा से कभी प्रेरित नहीं होते। और भले ही भगवान उन्हें ऐसे आशीर्वाद प्रदान करें, भक्त अक्सर उन्हें स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (11.20.34) के ग्यारहवें सर्ग में भगवान कृष्ण ने कहा है:

ना किचित साधवो धीरा

भक्ता ह्य एकांतिनो मम

वांछंत्य अपि मया दत्तम

कैवल्यम् अपुनर्-भवम्

"क्योंकि मेरे भक्त संत प्रवृत्ति के होते हैं और गहन बुद्धि वाले होते हैं, अतः वे स्वयं को पूर्णतः मेरे प्रति समर्पित कर देते हैं और मेरे अलावा कुछ भी नहीं चाहते। वास्तव में, भले ही मैं उन्हें जन्म और मृत्यु से मुक्ति प्रदान करूं, फिर भी वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं।" इसलिए, यह उचित है कि गोपियाँ भगवान कृष्ण के उन्हें ज्ञान-योग सिखाने के प्रयास पर हल्के से ईर्ष्यालु स्वर में प्रतिक्रिया करती हैं।

इस प्रकार, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, इस श्लोक में गोपियाँ जो शब्द बोलती हैं, उनकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है: "हे सूर्य जो अज्ञानता के अंधकार को सीधे नष्ट कर देते हैं, हम इस दार्शनिक ज्ञान की सूर्य किरणों से झुलस गए हैं। हम चकोर पक्षी हैं जो केवल आपके सुंदर चेहरे से निकलने वाली चांदनी पर निर्वाह कर सकते हैं। कृपा करके हमारे साथ वृंदावन वापस आइए और इस तरह हमें वापस जीवन में लाएँ।"

और अगर वे कहते हैं, "तो द्वारका आओ न; वहाँ हम एक साथ आनंद लेंगे, " वे उत्तर देती हैं कि श्री वृंदावन उनका घर है, और वे उससे इतना जुड़ी हुई हैं कि वे कहीं और निवास करने के लिए नहीं जा सकतीं। गोपियों का तात्पर्य है कि वहीँ, कृष्ण उन्हें अपनी पगड़ी में मोर पंख पहनकर और अपनी बाँसुरी से मोहक संगीत बजाकर आकर्षित कर सकते हैं। केवल वृंदावन में फिर से प्रकट होकर ही गोपियाँ बचाई जा सकती हैं, न कि उस पर किसी अन्य प्रकार के ध्यान या आत्म के सैद्धांतिक ज्ञान से।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत बयासी अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)