श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 82: वृन्दावनवासियों से कृष्ण तथा बलराम की भेंट  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  10.82.45 
अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोऽन्तरं बहि: ।
भौतिकानां यथा खं वार्भूर्वायुर्ज्योतिरङ्गना: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
हे स्त्रियो, मैं समस्त प्राणियों का आदि और अंत हूँ, और मैं उनके भीतर और बाहर दोनों जगह मौजूद हूँ, ठीक वैसे ही जैसे आकाश, जल, पृथ्वी, वायु और अग्नि सभी भौतिक वस्तुओं का आदि और अंत है और उनके भीतर और बाहर दोनों जगह मौजूद रहते हैं।
 
O ladies, I am the beginning and the end of all beings and I exist within and outside them just as sky, water, earth, air and fire are the beginning and the end of all material things and exist within and outside them.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, इस श्लोक में भगवान कृष्ण का इशारा इस विचार की ओर है: "यदि तुम्हें पता है कि मैं परमेश्वर हूं, तो तुमको मुझसे अलग होने का कोई दुःख नहीं होना चाहिए, क्योंकि मैं सभी अस्तित्व में व्याप्त हूं। तुम्हारा दुख भेदभाव की कमी के कारण ही होना चाहिए। इसलिए कृपया मुझसे यह निर्देश लें, जो तुम्हारे अज्ञान को दूर करेगा।

“परंतु सच्चाई तो यह है कि तुम गोपियाँ अपने पिछले जन्मों में योग की महान आचार्य थी, और इसलिए तुम्हें पहले से ही ज्ञान-योग का यह विज्ञान पता होना चाहिए। इसके अलावा, क्या मैं इसे स्वयं या मेरे प्रतिनिधि, जैसे उद्धव के माध्यम से तुम्हें पढ़ाने की कोशिश करूं, यह वांछित परिणाम नहीं देगा। ज्ञान-योग केवल उन लोगों को दुख देता है जो परमात्मा के शुद्ध प्रेम में पूरी तरह से डूबे हुए हैं।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)