श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 82: वृन्दावनवासियों से कृष्ण तथा बलराम की भेंट  »  श्लोक 3-6
 
 
श्लोक  10.82.3-6 
नि:क्षत्रियां महीं कुर्वन् राम: शस्‍त्रभृतां वर: ।
नृपाणां रुधिरौघेण यत्र चक्रे महाह्रदान् ॥ ३ ॥
ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोऽपि कर्मणा ।
लोकं सङ्ग्राहयन्नीशो यथान्योऽघापनुत्तये ॥ ४ ॥
महत्यां तीर्थयात्रायां तत्रागन् भारती: प्रजा: ।
वृष्णयश्च तथाक्रूरवसुदेवाहुकादय: ॥ ५ ॥
ययुर्भारत तत् क्षेत्रं स्वमघं क्षपयिष्णव: ।
गदप्रद्युम्नसाम्बाद्या: सुचन्द्रशुकसारणै: ।
आस्तेऽनिरुद्धो रक्षायां कृतवर्मा च यूथप: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
राजाओं से पृथ्वी को मुक्त कराने के पश्चात, महान योद्धा भगवान परशुराम ने समंतक-पंचक में राजाओं के खून से विशाल झीलें बनाईं। हालांकि, उन पर कर्म का प्रभाव नहीं पड़ता, फिर भी उन्होंने आम लोगों को शिक्षित करने के लिए वहां यज्ञ किया। इस प्रकार उन्होंने खुद को पापों से मुक्त करने के लिए सामान्य व्यक्ति की तरह काम किया। अब, पूरे भारतवर्ष से बहुत से लोग तीर्थयात्रा के लिए समंत-पंचक आने लगे। हे भरतवंशी, इस पवित्र स्थान पर आने वालों में कई वृष्णिजन - जैसे गद, प्रद्युम्न और साम्ब - अपने पापों से मुक्ति पाने की आशा में आए थे। अक्रूर, वसुदेव, आहुक और अन्य राजा भी वहां गए। सुचन्द्र, शुक और सारण के साथ अनिरुद्ध और उनकी सेना के कमांडर कृतवर्मा, शहर की रक्षा के लिए द्वारका में ही रहे।
 
After having made the earth free of kings, Lord Parasurama, the greatest of warriors, created large lakes from the blood of kings in Samanta-pancaka. Although Parasurama was not affected by the consequences of his actions, he performed a sacrifice there to teach the common people. Thus, in order to free himself from his sins, he behaved like an ordinary man. Now, in this Samanta-pancaka, a very large number of people from all parts of Bharata had come for pilgrimage. O descendant of Bharata, among those who came to this place of pilgrimage were many Vrishnis—such as Gad, Pradyumna and Samba—to get rid of their sins. Akrura, Vasudeva, Ahuka and other kings also went there. Aniruddha, along with Sucandra, Suka and Sarana, and with them Kritavarma, the leader of their armed forces, remained to defend Dvaraka.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, श्री कृष्ण के पोते अनिरुद्ध द्वारका में शहर की रक्षा करने के लिए ही रहे क्योंकि वह मूल रूप से भगवान विष्णु के साक्षात अवतार हैं जो आध्यात्मिक ग्रह श्वेतद्वीप की रक्षा करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)