श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 82: वृन्दावनवासियों से कृष्ण तथा बलराम की भेंट  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  10.82.18 
कुन्त्युवाच
आर्य भ्रातरहं मन्ये आत्मानमकृताशिषम् ।
यद् वा आपत्सु मद्वार्तां नानुस्मरथ सत्तमा: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
महारानी कुंती बोलीं: हे मेरे आदरणीय भाई, मैं महसूस कर रही हूँ कि मेरी इच्छाएँ अधूरी रह गई हैं क्योंकि आप सभी पवित्र होने के नाते भी मेरी विपत्ति के समय में मुझे भूल गए थे।
 
Queen Kunti said: O my respected brothers, I feel that my wishes have failed, for, although you are all of extremely saintly disposition, you forgot me in the days of my distress.
तात्पर्य
यहां रानी कुन्ती अपने भाई वसुदेव को संबोधित करती हैं.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)