श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 82: वृन्दावनवासियों से कृष्ण तथा बलराम की भेंट  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.82.16 
ततोऽभिवाद्य ते वृद्धान् यविष्ठैरभिवादिता: ।
स्वागतं कुशलं पृष्ट्वा चक्रु: कृष्णकथा मिथ: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
तब उन सभी ने अपने वरिष्ठ लोगों को प्रणाम किया और अपने से छोटे रिश्तेदारों से आदर प्राप्त किया। एक-दूसरे की यात्रा के सुख-दुख और कुशलता पूछने के बाद, वे श्री कृष्ण के बारे में बातें करने लगे।
 
Then all of them greeted their elders and received respect from their younger relatives. After asking each other about the comfort and well-being of their journey, they started talking about Krishna.
तात्पर्य
ये वैष्णवों के विशेष व्यवहार है। यहाँ तक कि इस भौतिक संसार में पारिवारिक बंधन जो सामान्य जीवों को भ्रमित करते हैं, वो भी उन लोगों के लिए बाधा नहीं होते जिनके परिवार के सभी सदस्य भगवान के शुद्ध भक्त होते हैं। निवैयक्तिकवादी इन अंतरंग संबंधों की सराहना करने की क्षमता नहीं रखते, क्योंकि उनका दर्शन किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत, भावनात्मक अस्तित्व को भ्रमपूर्ण कहकर उसकी निंदा करता है। जब निवैयक्तिकवाद के अनुयायी कृष्ण और उनके भक्तों के प्रेमपूर्ण संबंधों को समझने का ढोंग करते हैं, तो वे केवल खुद के लिए और जो भी उनकी बात सुनते हैं, उनके लिए तबाही पैदा करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)