श्रीभगवानुवाच
किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात् ।
अण्वप्युपाहृतं भक्तै: प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत् ।
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते ॥ ३ ॥
अनुवाद
भगवान ने कहा: हे ब्राह्मण, तुम मेरे लिए अपने घर से कौन-सा उपहार लाये हो? मैं अपने भक्तों द्वारा शुद्ध प्रेमवश अर्पित की गयी छोटी से छोटी भेंट को भी महान मानता हूँ, लेकिन अभक्तों द्वारा अर्पित की गयी बड़ी से बड़ी भेंट भी मुझे प्रसन्न नहीं कर पाती।
The Lord said: O Brahmin, what gift have you brought for Me from your home? Even the smallest gift presented by My devotees out of pure love is considered by Me as great, but even the biggest gift presented by nondevotees does not satisfy Me.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥