श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  10.8.40 
किं स्वप्न एतदुत देवमाया
किं वा मदीयो बत बुद्धिमोह: ।
अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य
य: कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोग: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
[माता यशोदा अपने मन में सोचने लगीं]: क्या यह एक स्वप्न है या किसी बाहरी शक्ति द्वारा फैलाई गई एक भ्रमपूर्ण सृष्टि है? क्या ये बालक मेरी बुद्धि शक्ति का प्रकटीकरण है या मेरे बच्चे की योगशक्ति है?
 
[Mother Yashoda began to reason with herself]: Is this a dream or an illusionary creation of external power? Has this appeared from my own intellect? Or is this some yogic power of my child?
तात्पर्य
माता यशोदा जब अपने बालक के मुख में यह अद्भुत प्रकटीकरण देखती हैं तब अपने आप से ही विवाद करने लगती हैं कि यह स्वप्न है या नहीं। फिर विचार करती हैं, "मैं स्वप्न नहीं देख रही हूँ क्योंकि मेरी आँखें खुली हो रही हैं। मैं प्रत्यक्ष देख रही हूँ। मैं न तो सोई हुई हूँ और न स्वप्न देख रही हूँ। तब यह कोई देवमाया ही होगी परन्तु वह भी नहीं। देवता लोग मुझे यह सब क्यों दिखाएँगे? मैं एक तुच्छ स्त्री हूँ, जिसका देवताओं से कोई नाता नहीं। फिर वह मुझे देवमाया में डालने का कष्ट क्यों करेंगे? वह भी नहीं हो सकता"। तब माता यशोदा विचार करती हैं कि यह मूढ़ता के कारण तो नहीं, "मैं स्वस्थ हूँ, मैं रोगग्रस्त नहीं। मूढ़ता भी क्यों हो? मेरा मस्तिष्क व्यभिचारित भी नहीं हो सकता क्योंकि मैं सोचने के लिए बिल्कुल ही स्वस्थ हूँ। तब यह कोई मेरे पुत्र का ही रहस्यशक्ति से होना चाहिए जैसा गर्गमुनि ने कहा था"। इस प्रकार अंत में निश्चय किया कि अपने पुत्र की ही यह लीला है, और कुछ नहीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)