श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  10.8.28 
कृष्णस्य गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कौमारचापलम् ।
श‍ृण्वन्त्या: किल तन्मातुरिति होचु: समागता: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण की अति मनमोहक और बाल-सुलभ चंचलता को देखकर, पड़ोस की सभी गोपियाँ कृष्ण की लीलाओं के बारे में बार-बार सुनने के लिए माता यशोदा के पास जाती थीं और उनसे इस तरह कहती थीं।
 
Seeing the very attractive childlike playfulness of Krishna, all the Gopis of the neighbourhood would come to mother Yashoda to hear again and again about the games of Krishna and would tell her like this.
तात्पर्य
कृष्ण की सभी क्रियाएँ भक्तों को सदैव आकर्षक लगती हैं। इसलिए पड़ोसियों, जो माँ यशोदा के मित्र थे, ने माँ यशोदा को कृष्ण द्वारा पड़ोस में किए जा रहे सभी कार्यो के बारे में अवगत कराया। माँ यशोदा अपने बेटे के द्वारा किए गए कार्यो की बातें सुनने के लिए अपने घरेलू कामों को छोड़ कर पड़ोस के दोस्तों द्वारा दी गई जानकारी का आनंद उठाती थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)