यह ध्यान दिया जा सकता है कि श्रील जीव गोस्वामी ने अपनी पुस्तक क्रम-संदर्भ में इस श्लोक के उद्देश्य को समझाया है। प्रत्येक सहस्राब्दी में, कृष्ण अपने मूल काले रूप में एक अलग रूप में प्रकट होते हैं, या तो सफेद, लाल या पीले रंग में, लेकिन इस बार वह व्यक्तिगत रूप से अपने मूल, काले रूप में प्रकट हुए और, जैसा कि गर्ग मुनि ने भविष्यवाणी की थी, नारायण की शक्ति का प्रदर्शन किया। क्योंकि इस रूप में भगवान का परम व्यक्तित्व स्वयं को पूरी तरह से प्रदर्शित करता है, उनका नाम श्री कृष्ण है, जो सर्व-आकर्षक है।
वास्तव में, कृष्ण सभी अवतारों के स्रोत हैं, और इसलिए विभिन्न अवतारों की सभी विशेषताएं कृष्ण में मौजूद हैं। जब कृष्ण अवतार लेते हैं, तो अन्य सभी अवतारों की सभी विशेषताएं पहले से ही उनके भीतर मौजूद होती हैं। अन्य अवतार कृष्ण के आंशिक प्रतिनिधित्व हैं, जो सर्वोच्च सत्ता के पूर्ण अवतार हैं। यह समझना होगा कि सर्वोच्च सत्ता, चाहे शुक्ल, रक्त या पीता (सफेद, लाल या पीले) के रूप में प्रकट हो, एक ही व्यक्ति है। जब वह विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं, तो वह अलग-अलग रंगों में प्रकट होते हैं, जैसे धूप, जिसमें सात रंग होते हैं। कभी-कभी धूप के रंगों को अलग-अलग दर्शाया जाता है; अन्यथा धूप को मुख्य रूप से तेज रोशनी के रूप में देखा जाता है। विभिन्न अवतार, जैसे कि मन्त्र-अवतार, लीला-अवतार और दशा-अवतार, सभी कृष्ण-अवतार में शामिल हैं। जब कृष्ण प्रकट होते हैं, तो सभी अवतार उनके साथ प्रकट होते हैं। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.3.26) में वर्णित है:
अवतारा ह्य असंख्येया
हरेश सत्व-निधेर द्विजाः
यथाविदासीनाः कुल्यः
सरसः स्युः सहस्रशः
अवतार निरंतर प्रकट होते हैं, जैसे निरंतर बहता पानी। कोई भी यह नहीं बता सकता कि बहते पानी में कितनी तरंगे हैं, और इसी तरह अवतारों की कोई सीमा नहीं है। और कृष्ण सभी अवतारों का पूर्ण प्रतिनिधित्व हैं क्योंकि वे सभी अवतारों के स्रोत हैं। कृष्ण अंशी हैं, जबकि अन्य अंश हैं, कृष्ण का हिस्सा। हम सहित सभी जीवित इकाइयाँ अंश हैं (ममैवांशो जीव-लोके जीव-भूतः सनातनः)। ये अंश अलग-अलग परिमाण के होते हैं। मनुष्य (जो सूक्ष्म अंश हैं) और देवता, विष्णु-तत्व और अन्य सभी जीवित प्राणी सभी सर्वोच्च का हिस्सा हैं। नित्यो नित्यानां चेतनश् चेतनानां (कठ उपनिषद 2.2.13)। कृष्ण सभी जीवित प्राणियों का पूर्ण प्रतिनिधित्व हैं, और जब कृष्ण उपस्थित होते हैं, तो सभी अवतार उन्हीं में शामिल हो जाते हैं।
श्रीमद्भगवतम का ग्यारहवाँ सर्ग युगानुक्रम से प्रत्येक युग के लिये अवतारों का वर्णन करता है। भगवतम में कहा गया है, कृते शुक्लश्चतुर्बाहुः, त्रेतायां रक्तवर्णोसौ, द्वापरे भगवान् श्यामः और कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्। हम वास्तव में देखते हैं कि कलियुग में, भगवान पित-वर्ण अर्थात पीले रंग के गौरसुन्दर के रूप में प्रकट हुए, यद्यपि भगवतम कृष्णवर्णम् की बात करता है। इन सभी कथनों को समायोजित करने के लिए, व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि यद्यपि कुछ युगों में कुछ रंग प्रमुख होते हैं, पर प्रत्येक युग में, जब भी कृष्ण प्रकट होते हैं, सभी रंग उपस्थित होते हैं। कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्: यद्यपि चैतन्य महाप्रभु कृष्ण यानी काले रंग के बिना प्रकट होते हैं, उन्हें स्वयं कृष्ण ही माना जाता है। इदानी कृष्णतां गतः। वही मूल कृष्ण जो विभिन्न वर्णों में प्रकट होते हैं, अब प्रकट हो चुके हैं। असन शब्द इंगित करता है कि वे हमेशा उपस्थित रहते हैं। जब भी भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व अपने पूर्ण विस्तार में प्रकट होते हैं, उन्हें कृष्णवर्णम् माना जाता है, यद्यपि वे भिन्न-भिन्न रंगों में प्रकट होते हैं। प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि चैतन्य महाप्रभु छन्न हैं; अर्थात, यद्यपि वे कृष्ण हैं, वे पीले रंग से आच्छादित हैं। इस प्रकार, गौड़ीय वैष्णव इस निष्कर्ष को स्वीकार करते हैं कि यद्यपि चैतन्य महाप्रभु पीत रंग में प्रकट हुए, वे कृष्ण हैं।
कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं
संगोपांगास्त्रपार्षदम्
यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्
यजन्ति हि सुमेधसः
(भागवत 11.5.32)
