श्रीशुक उवाच
एवं सम्प्रार्थितो विप्र: स्वचिकीर्षितमेव तत् ।
चकार नामकरणं गूढो रहसि बालयो: ॥ ११ ॥
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब नन्द महाराज ने गर्गमुनि से विशेष प्रार्थना की कि वे जो कुछ पहले से ही करना चाहते थे उसे करें, तो उन्होंने एकांत स्थान में कृष्ण और बलराम का नामकरण संस्कार सम्पन्न किया।
Sukadeva Goswami further said: When Nanda Maharaja specifically prayed to Gargamuni to do what he had already wanted to do, he performed the naming ceremony of Krṣṇa and Balarāma in a secluded place.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥