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श्लोक 10.79.6  |
सोऽपतद्भुवि निर्भिन्नललाटोऽसृक् समुत्सृजन् ।
मुञ्चन्नार्तस्वरं शैलो यथा वज्रहतोऽरुण: ॥ ६ ॥ |
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| अनुवाद |
| पीड़ा से कराहता हुआ बल्वल पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके सिर पर गहरी चोट थी और ज़ोर से खून बह रहा था। वो ऐसे लग रहा था जैसे विजली से बिंधे हुए लाल पहाड़ पर खून की बौछार हो रही हो। |
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| पीड़ा से कराहता हुआ बल्वल पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके सिर पर गहरी चोट थी और ज़ोर से खून बह रहा था। वो ऐसे लग रहा था जैसे विजली से बिंधे हुए लाल पहाड़ पर खून की बौछार हो रही हो। |
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