फिर बाद में श्री बलरामजी नैमिषारण्य में लौट आए, जहाँ ऋषियों ने उन्हे, जो यज्ञ के स्वरूप हैं, बहुत प्रसन्नता के साथ अनेक प्रकार के वैदिक यज्ञ करवाए। अब बलरामजी समस्त युद्धों से निवृत्त हो चुके थे।
Later Balarama returned to Naimisharanya, where the sages, who were the manifestation of all sacrifices, happily engaged him in performing various types of Vedic sacrifices. Balarama was now free from all wars.
तात्पर्य
श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "[जब भगवान बलराम] नैमिषारण्य में पवित्र तीर्थ यात्रा पर गए, ...संत, साधु और ब्राह्मण सभी उनका स्वागत करने के लिए खड़े हो गए। उन्होंने समझा कि भगवान बलराम, यद्यपि एक क्षत्रिय थे, अब युद्ध के कार्यों से सेवानिवृत्त हो चुके थे। जो ब्राह्मण और संत सदैव शांति और स्थिरता के लिए थे, वे इस बात से बहुत प्रसन्न थे। वे सभी बलराम को बड़े स्नेह के साथ गले लगाया और उन्हें नैमिषारण्य के उस पवित्र स्थान पर विभिन्न प्रकार के यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया। वास्तव में भगवान बलराम को साधारण मनुष्यों के लिए अनुशंसित यज्ञ करने की कोई आवश्यकता नहीं थी; वह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, और इसलिए वह स्वयं ऐसे सभी यज्ञों का भोग्य हैं। इस प्रकार, यज्ञ करने की उनकी अनुकरणीय कार्रवाई केवल आम आदमी को एक पाठ देने के लिए थी कि कैसे वेद के निषेधाज्ञाओं का पालन करना चाहिए।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥