श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 78: दन्तवक्र, विदूरथ तथा रोमहर्षण का वध  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  10.78.6 
तर्ह्यानृण्यमुपैम्यज्ञ मित्राणां मित्रवत्सल: ।
बन्धुरूपमरिं हत्वा व्याधिं देहचरं यथा ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
"अरे अज्ञानी! मित्रों का उपकार करने को ही मैं अपना कर्त्तव्य मानता हूँ। तुम्हें मारकर मैं उसी कर्त्तव्य का पालन करूँगा और तुम्हारे ऋण से उऋण हो जाऊँगा। सम्बन्धी के रूप में तुम मेरे शरीर में रोग की तरह प्रच्छन्न शत्रु हो।"
 
“O foolish one! I am grateful to my friends and by killing you I will be free from their debt. In the form of a relative you are an enemy disguised as a disease inside my body.”
तात्पर्य
आचार्यों के अनुसार, अज्ञ शब्द इस ओर संकेत करता है कि भगवान कृष्ण की तुलना में कोई अधिक बुद्धिमान नहीं है। इसके अलावा, बंधु-रूपम शब्द इंगित करता है कि भगवान कृष्ण वास्तव में हर किसी के सच्चे दोस्त हैं, और व्याधि से संकेत मिलता है कि भगवान कृष्ण परमात्मा हैं, जो हृदय के भीतर ध्यान का विषय हैं, जो हमारा मानसिक संकट दूर करते हैं। इसके अलावा, आचार्य हत्वा शब्द का अनुवाद ज्ञानत्वा के रूप में करते हैं; दूसरे शब्दों में, कृष्ण को ठीक से जानने से वास्तव में अपने सभी दोस्तों को मुक्त किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)