श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 78: दन्तवक्र, विदूरथ तथा रोमहर्षण का वध  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.78.4 
गदामुद्यम्य कारूषो मुकुन्दं प्राह दुर्मद: ।
दिष्‍ट्या दिष्‍ट्या भवानद्य मम द‍ृष्टिपथं गत: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी गदा को उठाते हुए, करूष के उन्मत्त राजा ने भगवान् मुकुन्द से कहा, "अरे भाग्य! क्या भाग्य मिला है! कि आप आज मेरे सामने आये हैं!"
 
Raising his mace, the wicked king of Karusha said to Lord Mukunda, “What good fortune! What good fortune! That you have come before me today.”
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी ने समझाया है कि तीन जन्मों तक प्रतीक्षा करने के बाद, दंतवक्र, जो पहले वैकुण्ठ में द्वारपाल थे, अब आध्यात्मिक दुनिया में लौट सकते थे। इसलिए उनके कथन का पारलौकिक अर्थ है: "कितना भाग्यशाली! मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि आज मैं आध्यात्मिक दुनिया में अपनी संवैधानिक स्थिति में लौट सकता हूँ!" अगले पद में, दंतवक्र कृष्ण को माता-पक्षीय चचेरे भाई मातुलेय के रूप में संदर्भित करेंगे। दंतवक्र की माँ, श्रुतश्रवा, कृष्ण के पिता वसुदेव की बहन थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)