अप्रत्युत्थायिनं सूतमकृतप्रह्वणाञ्जलिम् ।
अध्यासीनं च तान् विप्रांश्चुकोपोद्वीक्ष्य माधव: ॥ २३ ॥
अनुवाद
देखकर श्री बलराम अत्यंत क्रोधित हुए कि कैसे यह सूत जाति का सदस्य खड़ा होना, नमस्कार करना या हाथ जोड़ना नहीं चाहता और विद्वानों से ऊपर बैठा है।
Sri Balarama became extremely angry to see how this member of the Suta caste failed to stand up, greet or fold his hands and how he was sitting above all the learned Brahmins.
तात्पर्य
रोमहर्षण ने किसी भी मानक तरीके से भगवान बलराम का अभिवादन करने में विफल रहे था। साथ ही, निम्न जाति का होने के बावजूद, वे ऊँचे ब्राह्मणों के समूह के ऊपर बैठ गए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥