दंतवक्र के वध के सम्बन्ध में, पद्म पुराण के उत्तर-खंड (279) निम्नलिखित गद्य में और अधिक विवरण देता है: अथ शिशुपालं निहतं श्रुत्वा दंतवक्रः कृष्णेन सह योद्धुं मथुराम आगमा। कृष्णस्तु तच्छ्रुत्वा रथम आरुह्य मथुराम आययौ। "फिर, यह सुनकर कि शिशुपाल मारा गया है, दंतवक्र कृष्ण के खिलाफ लड़ने के लिए मथुरा गया। इसके अलावा, जब कृष्ण ने यह सुना, तो वह अपने रथ पर चढ़ा और मथुरा गया।"
तयोर् दंतवक्र-वासुदेवयोर् अहो-रात्रं मथुरा-द्वारी संग्रामः समवर्तत; कृष्णस्तु गदया तं जगान; स तु चूर्णित-सर्वांगो वज्र-निर्भिन्नो महिधर इव गतासुर अवनि-तले निपपात; सोपि हरेः सारूप्येण योगी-गम्यं नित्यानंद-सुख-दं शाश्वतं परमं पदम अवाप: "दोनों के बीच - दंतवक्र और भगवान वासुदेव - के बीच मथुरा के द्वार पर एक युद्ध शुरू हुआ जो पूरे दिन और रात चला। अंत में कृष्ण ने दंतवक्र को अपने गदा से मारा, जिसके बाद दंतवक्र जमीन पर बेजान होकर गिर गया, उसके सभी अंग बिजली के बोल्ट से बिखरे हुए पहाड़ की तरह टूट गए। दंतवक्र ने भगवान के समान रूप प्राप्त करने की मुक्ति प्राप्त की, और इस तरह उन्होंने भगवान के शाश्वत, सर्वोच्च निवास को भी प्राप्त किया, जो पूर्ण योगियों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जो चिरस्थायी आध्यात्मिक आनंद प्रदान करता है।"
इस प्रकार जय-विजय सनक आदि के शाप के बहाने केवल भगवान के लीला के लिए संसृति में अवतरित हुए और तीनों जीवन में उन्हीं के द्वारा मारे गए। फिर, इन तीन जन्मों की पूर्णता के बाद, उन्हें मुक्ति मिली।''
पद्म पुराण के इस अंश में "कृष्णस्तु तच्छ्रुत्वा" शब्द, "जब कृष्ण ने इस बारे में सुना," यह दर्शाता है कि भगवान ने नारद से सुना, जो मन की तरह तेजी से यात्रा करते हैं, कि दंतवक्र मथुरा चला गया था। इसलिए शाल्व को मारने के तुरंत बाद, पहले द्वारका में प्रवेश किए बिना, भगवान अपने रथ पर एक पल में मथुरा के आसपास पहुंच गए, जो मन की तरह तेजी से चलता है, और वहां उन्होंने दंतवक्र को देखा। इस प्रकार आज भी, मथुरा के द्वार पर द्वारका की ओर मुख करके, दतिहा के नाम से एक गाँव जाना जाता है, जो संस्कृत दंतवक्र-हा से लिया गया है, जिसका अर्थ है "दंतवक्र का हत्यारा।" इस गांव की स्थापना कृष्ण के परपोते वज्र ने की थी।
पद्म पुराण के उसी खंड में, ये कथन इस प्रकार हैं: कृष्णोपि तं हत्वा यमुनाम उत्तीर्य नंद-व्रजं गत्वा सोटकण्ठौ पितरौ अभिवाद्याश्वास्य ताभ्यां साश्रु-सेकम आलिंगितः सकल-गोप-वृद्धान प्रणम्य बहु-वास्त्र-आभरणादिभिस तत्र-स्थान संतर्पयामास। ''और उसे मारने के बाद [विदूरथ], कृष्ण ने यमुना को पार किया और नंद के गोचर गांव गए, जहाँ उन्होंने अपने दुखी माता-पिता को सम्मानित और सांत्वना दी। उन्होंने उसे आंसुओं से भीगाया और उसे गले लगाया, और फिर भगवान ने बड़े गोपों को नमस्कार किया और सभी निवासियों को वस्त्र, आभूषण आदि के प्रचुर उपहारों से संतुष्ट किया।"
कालिंद्याः पुलिने रम्ये
पुण्य-वृक्ष-समाचि
गोप-नारीभिर अनिशं
क्रीडायम आसा केशवः
रम्य-केलि-सुखेनैव
गोप-वेश-धरः प्रभुः
बहु-प्रेम-रसेनात्र
मास-द्वयं उवासा ह
''भगवान केशव कालिंदी के आकर्षक तट पर लगातार गोपियों के साथ खेलते थे, जो पवित्र वृक्षों से भरा हुआ था। इस प्रकार सर्वोच्च भगवान, गोप के रूप में दिखाई पड़ते हुए, दो महीने तक वहाँ रहे, प्रेमपूर्ण पारस्परिकता के विभिन्न भावों में अंतरंग लीलाओं का आनंद लिया।''
ततः तत्रस्थानन्दगोपाध्या सर्वे जनाः पुत्रदारादि सहिता वसुदेवप्रसादेन दिव्यरूपधरा विमानमारूढा परमं वैकुण्ठलोकमवापुः। कृष्णस्तु नन्दगोपव्रजौकसाम् सर्वेषां निरामयं स्वपदं दत्त्वा दिवि देवगणैः संस्तुयमानो द्वारवतीं विवेश।
इस अंश पर श्रील रूप गोस्वामी ने अपने लघुभागवतामृत (1.488-89) में इस प्रकार व्याख्या की है -
व्रजेशादरंशभूता
ये द्रोणाध्या अवतरण
कृष्णस्तानैव वैकुण्ठे
प्राहिनोदिति साम्प्रतम्
प्रेष्ठेभ्योपि प्रियत मैः
जनैर्गोकुलवासभिः
वृन्दारण्ये सदेवासौ
विहारं कुरते हरिः
"क्योंकि द्रोण और अन्य देवता पहले व्रजाधीप और अन्य वृंदावनवासियों में अपने अंश अवतारित कर चुके थे, इसलिये भगवान कृष्ण ने वैकुण्ठ को इन्हीं देवताओं को विदा किया। भगवान हरि अपने प्रेमी भक्तों, गोकुलवासियों के साथ वृन्दावन में नित्य विहार करते रहते हैं, जो कि उनके अन्य प्रियतम भक्तों से भी प्रिय हैं।"
पद्मपुराण के इस अंश में, नन्दगोपाध्या सर्वे जनाः पुत्रदारादि सहिताः ("नन्द गोप और अन्य, अपने पुत्रों और पत्नियों सहित") में पुत्र का अर्थ कृष्ण, श्रीदामा और सुबल जैसे पुत्र हैं, जबकि दारा का अर्थ श्री यशोदा और कीर्तदा जैसी पत्नियां हैं, जो राधारानी की माता थीं। सर्वे जनाः ("समस्त लोग") का अर्थ व्रजमंडल में रहने वाले सभी लोग हैं। इस प्रकार वे सभी सर्वश्रेष्ठ वैकुण्ठ लोक गोलोक में गए। दिव्यरूपधराः का अर्थ है कि गोलोक में वे देवताओं के लिये उपयुक्त विहार करते हैं, गोकुल में मनुष्यों के जैसे नहीं। भगवान रामचन्द्र के अवतार में जिस तरह अयोध्या के निवासी अपने वैयक्तिक शरीरों में वैकुण्ठ ले जाए जाएं, उसी प्रकार भगवान कृष्ण के अवतार में व्रजवासी अपने शरीरों में गोलोक गए थे।
द्वारका से व्रज की भगवान कृष्ण की यात्रा की पुष्टि श्रीमद् भागवतम् (1.11.9) के इस अंश से होती है - यर्ध्यम्बुजाक्षापससारा भो भवान् कुरून मधुन वाथा सुहृदद्दृक्षया। तत्राब्दकोट्य प्रतिमः क्षणो भवेत। "हे कमलनयन भगवान, जब भी आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने मथुरा, वृंदावन या हस्तिनापुर जाते हैं, आपकी अनुपस्थिति का प्रत्येक क्षण दस लाख वर्षों के समान लगता है।" भगवान बलदेव के व्रज चले जाने के बाद से भगवान कृष्ण व्रज में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने की इच्छा रखते थे, लेकिन द्वारका में उनकी माता, पिता और अन्य बड़ों ने उन्हें अनुमति देने से मना कर दिया था। हालाँकि, शाल्व के वध के बाद, जब कृष्ण ने नारद से सुना कि दंतवक्र मथुरा आया हुआ है, तो कोई भी भगवान के बिना द्वारका में प्रवेश किए वहाँ तुरंत जाने का विरोध नहीं कर सकता था। और दंतवक्र को मारने के बाद, वे व्रज में रहने वाले अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने का अवसर मिलेगा।
ऐसे विचार करते हुए, उद्धव द्वारा गोपियों के इन शब्दों के संकेतों को भी याद करते हुए - गायन्ति ते विषाद कर्मा - (भाग. 10.71.9) वह व्रज गए, और वहां के लोगों की जुदाई की भावना को दूर किया। दो महीने तक भगवान कृष्ण पहले की तरह ही वृंदावन में आनंद मनाते रहे, जहाँ से वह मथुरा में कंस को मारने के लिए गए थे। फिर, दो महीने के बाद, उन्होंने अपने माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों और दोस्तों के देवता भागों को वैकुंठ ले जाकर अपनी व्रज लीलाओं को सांसारिक नज़रों से छुपा लिया। इस प्रकार, एक पूर्ण पूर्ण अभिव्यक्ति में वह आध्यात्मिक दुनिया में गोलोक गए, दूसरे में वह व्रज में हमेशा के लिए आनंद लेते रहे जबकि भौतिक आँखों से अदृश्य थे, और फिर भी एक और में उन्होंने अपना रथ चढ़ा और अकेले द्वारका लौट आए। शौरासेन प्रांत के लोगों ने सोचा कि दंतावक्र को मारने के बाद कृष्ण ने अपने माता-पिता और अन्य प्रियजनों से मुलाकात की और अब द्वारका लौट रहे हैं। दूसरी ओर, व्रज के लोग यह नहीं समझ पाए कि वह अचानक कहां गायब हो गए हैं, और इसलिए वे पूरी तरह से चकित थे। इसके अलावा, शुकदेव ने माना कि परीक्षित महाराज सोच सकते हैं, "यह कैसा हुआ कि वही कृष्ण जिसने ग्वालों को अपने उसी शरीर में वैकुंठ प्राप्त कराया, उसी के कारण द्वारका के निवासियों ने अपने मौसल-लीला के दौरान ऐसी अशुभ स्थिति प्राप्त की?" इस प्रकार राजा इस व्यवस्था को अनुचित मान सकते थे क्योंकि उनकी स्वयं यदुओं के लिए आत्मीयता थी। यही कारण है कि शुकदेव गोस्वामी ने उन्हें इस लीला को सुनने की अनुमति नहीं दी, जो कि जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, श्री पद्म पुराण के उत्तरा-खंड में संबंधित है। श्री वैष्णव-तोषणी में, दसवें कैंटो पर सनातन गोस्वामी की टीका में, हम निम्नलिखित अनुक्रमिक क्रम में कालक्रम की सूची पाते हैं: पहला सूर्य ग्रहण के अवसर पर यात्रा थी, फिर राजसूय सभा, फिर जुआ का मैच और द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास , फिर पाण्डवों का वनवास, फिर शाल्व और दंतावक्र की हत्या, फिर कृष्ण की वृंदावन यात्रा, और अंत में वृंदावन लीलाओं का समापन।
