सभी महान भागवत व्याख्याकार इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दुख, मोह, लगाव और भय, जो की आत्मा के अज्ञान से उत्पन्न होते हैं, कभी भी प्रभु द्वारा स्थापित पारलौकिक नाटकीय शगलों में उपस्थित नहीं हो सकते। श्रील जीव गोस्वामी ने इस बिन्दु को समझाने के लिए कृष्ण के शगलों के कई उदाहरण दिए हैं। उदाहरण के लिए, जब गोप-ग्वाल मुंह में अघासुर के मुंह में गए, प्रभु कृष्ण स्पष्ट रूप से आश्चर्यचकित थे। इसी प्रकार, जब ब्रह्मा प्रभु कृष्ण के गोप-ग्वाल दोस्तों और बछड़ों को ले गए, प्रभु सबसे पहले उनकी तलाश करने लगे मानो उन्हें नहीं पता कि वे कहाँ हैं। इस प्रकार प्रभु साधारण मनुष्य का पात्र निभाते हैं ताकि वे अपने भक्तों के साथ पारलौकिक शगल का आनंद उठा सकें। कभी भी भगवान के व्यक्तित्व के बारे में यह नहीं सोचना चाहिए कि वे एक साधारण व्यक्ति हैं, जैसा कि शुकदेव गोस्वामी इस श्लोक और अगले श्लोक में बताते हैं।
