शरैरग्न्यर्कसंस्पर्शैराशीविषदुरासदै: ।
पीड्यमानपुरानीक: शाल्वोऽमुह्यत्परेरितै: ॥ २४ ॥
अनुवाद
अपने शत्रु के वाणों से परेशान होती अपनी सेना और हवाई शहर को देखकर शाल्व भ्रमित हो गया, क्योंकि शत्रु के बाण आग और सूरज की तरह प्रहार कर रहे थे और सांप के जहर की तरह असहनीय हो रहे थे।
Śālva became bewildered when he saw his army and Vayava-puri being afflicted by the enemy's arrows, for the enemy's arrows were striking like fire and the sun, and were unbearable like serpent-venom.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी बताते हैं कि यादव सेनापतियों के बाण आग की तरह जलते हुए, सूरज की किरणों की भांति एक साथ सभी ओर से प्रहार करते हुए, और सांपो के जहर की तरह मात्र एक स्पर्श से ही जानलेवा सिद्ध होते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥