श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 75: दुर्योधन का मानमर्दन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  10.75.27 
हरिदासस्य राजर्षे राजसूयमहोदयम् ।
नैवातृप्यन्प्रशंसन्त: पिबन्मर्त्योऽमृतं यथा ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे साधारण व्यक्ति अमृत पीने से कभी नहीं अघाता, वैसे ही वे उस राजर्षि तथा हरि-सेवक द्वारा किए गए अद्भुत राजसूय यज्ञ की प्रशंसा करते थक नहीं रहे थे।
 
He never got tired of praising the wonderful Rajasuya Yagna performed by that king and Hari-sevak, just as an ordinary person never gets tired of drinking nectar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)