श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 72: जरासन्ध असुर का वध  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  10.72.19 
किं दुर्मर्षं तितिक्षूणां किमकार्यमसाधुभि: ।
किं न देयं वदान्यानां क: पर: समदर्शिनाम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
सहनशील व्यक्ति क्या नहीं सह सकता? पापी क्या नहीं करेगा? उदार व्यक्ति दान में क्या नहीं देगा? और समदृष्टि वाले के लिए कौन अजनबी है?
 
What cannot a tolerant person tolerate? What will a wicked person not do? What will a generous person not give away in charity? And who is an outsider for a person with equal vision?
तात्पर्य
पिछले श्‍लो‍क में भगवान कृष्‍ण और दोनों पांडव भाईयों, भीम और अर्जुन ने जरासंध से जो भी माँगा जाएगा, वो देने का वरदान माँगा है। यहाँ वे बताते हैं कि उन्‍हें अपनी इच्‍छा को विशिष्‍ट रूप से कहने की कोई आवश्‍यकता क्‍यों नहीं है।

आचार्य इस श्‍लो‍क पर इस प्रकार टिप्‍पणी करते हैं: जरासंध शायद सोच रहे होंगे, "क्‍या होगा अगर तुम मेरे पुत्र को माँगोगे, जिससे मेरा अलग होना असहनीय होगा?"

इस संभावित आपत्ति के लिए कृष्‍ण और पांडव उत्‍तर देते हैं, "सहनीय व्‍यक्ति के लिए कुछ भी असहनीय नहीं होता है।"

इसी तरह, जरासंध आपत्ति कर सकते हैं, "क्‍या होगा अगर तुम मुझसे शरीर या अपने प्रिय आभूषण एवं अन्‍य आभूषण देने को कहोगे, जो मेरे पुत्रों को देने के लिए हैं, सामान्‍य भिखारियों को नहीं?"

इसके लिए वे उत्‍तर देते हैं, "दानवीर के लिए दान में क्‍या नहीं दिया जा सकता है?" दूसरे शब्‍दों में, हर चीज दी जानी है।

जरासंध शायद यह भी आपत्ति कर सकते हैं कि वे अपने शत्रुओं को दान दे रहे होंगे। इस पर उनके अतिथि इस कथन से प्रतिवाद करते हैं कि: "समान रूप से देखने वालों के लिए कौन पराया होता है?" इस प्रकार श्री कृष्‍ण और पांडवों ने जरासंध को यह कहकर प्रोत्‍साहित किया कि बिना किसी विस्‍तृत चर्चा के वे उनकी इच्‍छा को स्‍वीकार कर लें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)