श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 72: जरासन्ध असुर का वध  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  10.72.18 
राजन् विद्ध्यतिथीन् प्राप्तानर्थिनो दूरमागतान् ।
तन्न: प्रयच्छ भद्रं ते यद्वयं कामयामहे ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
[कृष्ण, अर्जुन और भीम ने कहा] हे राजा, हमें दीन-दुखी अतिथि के रूप में जानें, जो बहुत दूर से आपके पास आए हैं। हम आपका कल्याण चाहते हैं। हम जो भी चाहें, कृपया हमें दें।
 
[Krishna, Arjuna and Bhima said] O King, please consider us as humble guests who have come to you from a far off place. We seek your welfare. Please give us whatever we desire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)