द्वैरथे स तु जेतव्यो मा शताक्षौहिणीयुत: ।
ब्राह्मण्योऽभ्यर्थितो विप्रैर्न प्रत्याख्याति कर्हिचित् ॥ ६ ॥
अनुवाद
एकाकी रथों की प्रतियोगिता में उसे हराया जा सकता है, किंतु अपनी एक सौ अक्षौहिणी सेना के साथ होने पर वह नहीं हराया जा सकता। तथा, जरासंध ब्राह्मण संस्कृति के प्रति इतना समर्पित है कि वह ब्राह्मणों के अनुरोधों को कभी मना नहीं करता।
He can be defeated in a single chariot race but cannot be defeated with his army of one hundred Akshauhini. And Jarasandha is so fond of Brahmin culture that he never refuses the requests of Brahmins.
तात्पर्य
यह तर्क दिया जा सकता है क्योंकि केवल भीम ही जरासंध के व्यक्तिगत बल की बराबरी कर सकते थे, इसलिए जरासंध अपनी विशाल सेना से समर्थित होने पर और अधिक शक्तिशाली हो जाता। इसलिए, उद्धव यहाँ एकल युद्ध की सिफारिश करते हैं। लेकिन जरासंध को अपनी शक्तिशाली सेना का समर्थन छोड़ने के लिए कैसे राजी किया जा सकता है? यहाँ उद्धव सुराग देता है: जरासंध ब्राह्मणों के अनुरोध को कभी भी अस्वीकार नहीं करता, क्योंकि वह ब्राह्मण संस्कृति का समर्पित है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥