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श्लोक 10.71.35  |
ऊचु: स्त्रिय: पथि निरीक्ष्य मुकुन्दपत्नी-
स्तारा यथोडुपसहा: किमकार्यमूभि: ।
यच्चक्षुषां पुरुषमौलिरुदारहास-
लीलावलोककलयोत्सवमातनोति ॥ ३५ ॥ |
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| अनुवाद |
| चंद्रमा के साथ सितारों जैसे मुकुंद की पत्नियों को सड़क पर गुजरते देखकर स्त्रियाँ जोर-जोर से चिल्ला उठीं, "इन स्त्रियों ने कैसा पुण्य किया है कि श्रेष्ठतम पुरुष अपनी दयालु मुस्कान और चंचल भौंहों द्वारा उनकी आंखों को आनंदित कर रहे हैं?" |
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| चंद्रमा के साथ सितारों जैसे मुकुंद की पत्नियों को सड़क पर गुजरते देखकर स्त्रियाँ जोर-जोर से चिल्ला उठीं, "इन स्त्रियों ने कैसा पुण्य किया है कि श्रेष्ठतम पुरुष अपनी दयालु मुस्कान और चंचल भौंहों द्वारा उनकी आंखों को आनंदित कर रहे हैं?" |
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