श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 71: भगवान् की इन्द्रप्रस्थ यात्रा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  10.71.33 
प्राप्तं निशम्य नरलोचनपानपात्र-
मौत्सुक्यविश्लथितकेशदुकूलबन्धा: ।
सद्यो विसृज्य गृहकर्म पतींश्च तल्पे
द्रष्टुं ययुर्युवतय: स्म नरेन्द्रमार्गे ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
जब नगर की युवतियों ने सुना कि मनुष्यों के नेत्रों के लिए सुखदायक भगवान श्री कृष्ण आए हैं तो वे उन्हें देखने के लिए फुर्ती से राजमार्ग पहुँच गईं। उन्होंने अपने घर के काम छोड़ दिए और अपने पति को भी बिस्तर पर ही छोड़ दिया। उनकी उत्सुकता के कारण उनके बालों की गाँठें और कपड़े ढीले हो गए।
 
जब नगर की युवतियों ने सुना कि मनुष्यों के नेत्रों के लिए सुखदायक भगवान श्री कृष्ण आए हैं तो वे उन्हें देखने के लिए फुर्ती से राजमार्ग पहुँच गईं। उन्होंने अपने घर के काम छोड़ दिए और अपने पति को भी बिस्तर पर ही छोड़ दिया। उनकी उत्सुकता के कारण उनके बालों की गाँठें और कपड़े ढीले हो गए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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