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श्लोक 10.71.25  |
दृष्ट्वा विक्लिन्नहृदय: कृष्णं स्नेहेन पाण्डव: ।
चिराद् दृष्टं प्रियतमं सस्वजेऽथ पुन: पुन: ॥ २५ ॥ |
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| अनुवाद |
| अपने परमप्रिय मित्र भगवान श्रीकृष्ण को इतने लंबे समय के वियोग के बाद देखकर राजा युधिष्ठिर का हृदय स्नेह से द्रवित हो उठा और उन्होंने भगवान को बार-बार गले लगाया। |
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| अपने परमप्रिय मित्र भगवान श्रीकृष्ण को इतने लंबे समय के वियोग के बाद देखकर राजा युधिष्ठिर का हृदय स्नेह से द्रवित हो उठा और उन्होंने भगवान को बार-बार गले लगाया। |
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