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श्लोक 10.71.12  |
अथादिशत् प्रयाणाय भगवान् देवकीसुत: ।
भृत्यान् दारुकजैत्रादीननुज्ञाप्य गुरून् विभु: ॥ १२ ॥ |
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| अनुवाद |
| देवकी के पुत्र सर्वव्यापी भगवान् ने अपने बड़ों से विदा होने की इच्छा व्यक्त की। उसके बाद उन्होंने दारुक और जैत्र जैसे सेवकों को प्रस्थान की तैयारी करने को कहा। |
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| देवकी के पुत्र सर्वव्यापी भगवान् ने अपने बड़ों से विदा होने की इच्छा व्यक्त की। उसके बाद उन्होंने दारुक और जैत्र जैसे सेवकों को प्रस्थान की तैयारी करने को कहा। |
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