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श्लोक 10.70.38  |
तवेहितं कोऽर्हति साधु वेदितुं
स्वमाययेदं सृजतो नियच्छत: ।
यद् विद्यमानात्मतयावभासते
तस्मै नमस्ते स्वविलक्षणात्मने ॥ ३८ ॥ |
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| अनुवाद |
| आपके उद्देश्य को कौन समझ सकता है? अपनी भौतिक शक्ति से आप सृष्टि का विस्तार करते हैं और उसे अपने में समाहित भी कर लेते हैं। जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि सृष्टि का वास्तविक अस्तित्व है। आपको नमन है, जिसकी दिव्य स्थिति अचिंतनीय है। |
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| आपके उद्देश्य को कौन समझ सकता है? अपनी भौतिक शक्ति से आप सृष्टि का विस्तार करते हैं और उसे अपने में समाहित भी कर लेते हैं। जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि सृष्टि का वास्तविक अस्तित्व है। आपको नमन है, जिसकी दिव्य स्थिति अचिंतनीय है। |
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