श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 70: भगवान् कृष्ण की दैनिक चर्या  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  10.70.38 
तवेहितं कोऽर्हति साधु वेदितुं
स्वमाययेदं सृजतो नियच्छत: ।
यद् विद्यमानात्मतयावभासते
तस्मै नमस्ते स्वविलक्षणात्मने ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
आपके उद्देश्य को कौन समझ सकता है? अपनी भौतिक शक्ति से आप सृष्टि का विस्तार करते हैं और उसे अपने में समाहित भी कर लेते हैं। जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि सृष्टि का वास्तविक अस्तित्व है। आपको नमन है, जिसकी दिव्य स्थिति अचिंतनीय है।
 
Who can truly understand Your purpose? By Your material energy You expand this universe and then absorb it into Yourself, making it appear that it has real existence. Salutations to You, whose transcendental state is inconceivable.
तात्पर्य
श्रील प्रभुपाद ने नारद के साक्षात्कार की व्याख्या इस प्रकार दी है: "हे मेरे प्रभु, अपनी अकल्पनीय शक्तियों से आप इस ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति को बनाते हैं, बनाए रखते हैं और फिर इसे विसर्जित करते हैं। आपकी अकल्पनीय शक्ति के ही कारण यह भौतिक संसार, यद्यपि आध्यात्मिक संसार का एक छाया प्रतिबिंब है, तथ्यात्मक प्रतीत होता है। आप भविष्य में क्या करने की योजना बना रहे हैं, इसे कोई नहीं समझ सकता। आपकी अलौकिक स्थिति हमेशा सभी के लिए अकल्पनीय है। जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं केवल बार-बार आपको अपने विनम्र प्रणाम अर्पित कर सकता हूँ।"

शब्द सव-विलक्षणात्माने यह भी दर्शाता है कि भगवान कृष्ण की अपनी अनूठी प्रकृति और विशेषताएँ हैं। कोई भी ईश्वर के समान या ईश्वर से बड़ा नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)