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श्लोक 10.70.3  |
मुहूर्तं तं तु वैदर्भी नामृष्यदतिशोभनम् ।
परिरम्भणविश्लेषात् प्रियबाह्वन्तरं गता ॥ ३ ॥ |
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| अनुवाद |
| अपने प्रियतम की बाँहों में लेटी हुई महारानी वैदर्भी को यह शुभ घड़ी रास नहीं आती थी, क्योंकि इसका अभिप्राय था कि प्रियतम के आलिंगन से उन्हें विलग होना पड़ेगा। |
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| अपने प्रियतम की बाँहों में लेटी हुई महारानी वैदर्भी को यह शुभ घड़ी रास नहीं आती थी, क्योंकि इसका अभिप्राय था कि प्रियतम के आलिंगन से उन्हें विलग होना पड़ेगा। |
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