श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 70: भगवान् कृष्ण की दैनिक चर्या  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  10.70.28 
स्वप्नायितं नृपसुखं परतन्त्रमीश
शश्वद्भ‍येन मृतकेन धुरं वहाम: ।
हित्वा तदात्मनि सुखं त्वदनीहलभ्यं
क्लिश्यामहेऽतिकृपणास्तव माययेह ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, इस शवतुल्य शरीर, जो हमेशा डर से भरा रहता है, के साथ हम राजाओं के रिश्तेदार के सुख का बोझ उठा रहे हैं, जो कि एक सपने की तरह है। इस प्रकार हमने आत्मा के वास्तविक सुख को त्याग दिया है, जो तुम्हारी निस्वार्थ सेवा करने से मिलता है। इतने अधिक दुखी होने के कारण हम तुम्हारी माया के मन्त्र के तहत इस जीवन में बस पीड़ा भोग रहे हैं।
 
हे प्रभु, इस शवतुल्य शरीर, जो हमेशा डर से भरा रहता है, के साथ हम राजाओं के रिश्तेदार के सुख का बोझ उठा रहे हैं, जो कि एक सपने की तरह है। इस प्रकार हमने आत्मा के वास्तविक सुख को त्याग दिया है, जो तुम्हारी निस्वार्थ सेवा करने से मिलता है। इतने अधिक दुखी होने के कारण हम तुम्हारी माया के मन्त्र के तहत इस जीवन में बस पीड़ा भोग रहे हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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