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श्लोक 10.70.18  |
तत्रोपविष्ट: परमासने विभु-
र्बभौ स्वभासा ककुभोऽवभासयन् ।
वृतो नृसिंहैर्यदुभिर्यदूत्तमो
यथोडुराजो दिवि तारकागणै: ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब उस सभाभवन में सर्वशक्तिमान प्रभु अपने श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठते तो अपने अद्वितीय तेज से आकाश की सभी दिशाओं को प्रकाशित करते हुए शोभायमान होते हैं। पुरुषों में सिंह रूप यदुओं से घिरे हुए, यदुश्रेष्ठ वैसे ही प्रतीत होते हैं जैसे कि अनेक तारों के बीच चन्द्रमा। |
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| जब उस सभाभवन में सर्वशक्तिमान प्रभु अपने श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठते तो अपने अद्वितीय तेज से आकाश की सभी दिशाओं को प्रकाशित करते हुए शोभायमान होते हैं। पुरुषों में सिंह रूप यदुओं से घिरे हुए, यदुश्रेष्ठ वैसे ही प्रतीत होते हैं जैसे कि अनेक तारों के बीच चन्द्रमा। |
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