गृहीत्वा पाणिना पाणी सारथेस्तमथारुहत् ।
सात्यक्युद्धवसंयुक्त: पूर्वाद्रिमिव भास्कर: ॥ १५ ॥
अनुवाद
अपने सारथि के हाथ पकड़कर भगवान श्रीकृष्ण रथ पर बैठते और सात्यकि और उद्धव भी रथ पर बैठते। वह ठीक वैसे ही लग रहे थे जैसे सूरज पूर्व दिशा के पर्वत पर उदय हो रहा हो।
Holding the hands of His charioteer, Lord Krishna, along with Satyaki and Uddhava, climbed onto the chariot as if the sun was rising on the eastern mountain (Udayachala).
तात्पर्य
आचार्य बताते हैं की भगवान् के रथ के चालक अपनी हथेलियाँ जोड़ कर खड़े रहते थे और प्रभु उसके हथेलियों को अपने दाहिने हाथ से अपने हाथ में लेकर रथ पर चढ़ते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥