| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ » अध्याय 7: तृणावर्त का वध » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 10.7.4  | श्रीशुक उवाच
कदाचिदौत्थानिककौतुकाप्लवे
जन्मर्क्षयोगे समवेतयोषिताम् ।
वादित्रगीतद्विजमन्त्रवाचकै-
श्चकार सूनोरभिषेचनं सती ॥ ४ ॥ | | | | | | अनुवाद | | शुकदेव गोस्वामी आगे बोले : जब यशोदा की बालकलीलाएँ बढ़ने लगीं, जैसे लेटकर करवट बदलना एवं उठने का प्रयास करना, तब एक वैदिक उत्सव मनाया गया। ऐसे उत्सव में, जिसे "उत्थान" कहा जाता है और जो शिशु के पहली बार घर से बाहर निकलने के अवसर पर मनाया जाता है, शिशु को ठीक से नहलाया जाता है। जब कृष्ण तीन मास के हो गए तो माता यशोदा ने पड़ोस की अन्य महिलाओं के साथ यह उत्सव मनाया। उस दिन चन्द्रमा और रोहिणी नक्षत्र का योग था। इस महोत्सव को माता यशोदा ने ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण एवं पेशेवर गायकों की सहायता से सम्पन्न किया। | | | | शुकदेव गोस्वामी आगे बोले : जब यशोदा की बालकलीलाएँ बढ़ने लगीं, जैसे लेटकर करवट बदलना एवं उठने का प्रयास करना, तब एक वैदिक उत्सव मनाया गया। ऐसे उत्सव में, जिसे "उत्थान" कहा जाता है और जो शिशु के पहली बार घर से बाहर निकलने के अवसर पर मनाया जाता है, शिशु को ठीक से नहलाया जाता है। जब कृष्ण तीन मास के हो गए तो माता यशोदा ने पड़ोस की अन्य महिलाओं के साथ यह उत्सव मनाया। उस दिन चन्द्रमा और रोहिणी नक्षत्र का योग था। इस महोत्सव को माता यशोदा ने ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण एवं पेशेवर गायकों की सहायता से सम्पन्न किया। | | ✨ ai-generated | | |
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