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श्लोक 10.7.29  |
तमन्तरिक्षात् पतितं शिलायां
विशीर्णसर्वावयवं करालम् ।
पुरं यथा रुद्रशरेण विद्धं
स्त्रियो रुदत्यो ददृशु: समेता: ॥ २९ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब गोपियां कृष्णजी के लिए रो रही थीं उस समय वह दैत्य आकाश से पत्थर की एक बड़ी चट्टान पर गिरा और उसके सारे अंग टूट-फूट गए, मानो भगवान शिव के बाण से मारा गया त्रिपुरासुर हो। |
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| जब गोपियां कृष्णजी के लिए रो रही थीं उस समय वह दैत्य आकाश से पत्थर की एक बड़ी चट्टान पर गिरा और उसके सारे अंग टूट-फूट गए, मानो भगवान शिव के बाण से मारा गया त्रिपुरासुर हो। |
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