श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  10.7.26 
तृणावर्त: शान्तरयो वात्यारूपधरो हरन् ।
कृष्णं नभोगतो गन्तुं नाशक्नोद् भूरिभारभृत् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
वेगवान बवंडर का रूप धारण करके तृणावर्त असुर कृष्ण को आकाश में बहुत ऊँचाई तक ले गया, लेकिन जब कृष्ण असुर से अधिक भारी हो गए, तो असुर का वेग रुक गया और वह और अधिक आगे नहीं जा सका।
 
Trinavart Asura took the form of a fast whirlwind and took Krishna to a great height in the sky, but when Krishna became heavier than the Asura, the Asura's velocity stopped due to which he could not go any further.
तात्पर्य
कृष्ण और त्रनावर्त असुर के बीच एक योगिक शक्ति की प्रतियोगिता है। रहस्यवादी योग का अभ्यास करके असुर आम तौर पर आठ सिद्धियों में कुछ सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, यानि कि सिद्धताएँ, जैसे कि अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामवासायिता। लेकिन हालाँकि एक राक्षस ऐसी शक्तियाँ बहुत ही सीमित सीमा तक प्राप्त कर सकता है, वह कृष्ण की रहस्यमय शक्ति से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है, क्योंकि कृष्ण योगेश्वर हैं, सभी रहस्यमय शक्ति के स्रोत (यत्र योगेश्वरो हरिः)। कोई भी कृष्ण के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। कभी-कभी, बेशक, कृष्ण की रहस्यमय शक्ति के एक खंडित भाग को प्राप्त करने के बाद, असुर मूर्ख जनता के लिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और खुद को भगवान होने का दावा करते हैं, यह जाने बिना कि भगवान सर्वोच्च योगेश्वर हैं। यहाँ भी हम देखते हैं कि त्रनावर्त ने महिमा-सिद्धि को ग्रहण किया और कृष्ण को दूर ले गए जैसे कि कृष्ण एक साधारण बच्चे हों। लेकिन कृष्ण भी एक रहस्यमय महिमा-सिद्ध बने। जब माँ यशोदा उन्हें ले जा रही थीं, वे इतने भारी हो गए कि उनकी माँ, जो आमतौर पर उन्हें ले जाने की आदी थी, उन्हें सहन नहीं कर पाईं और उन्हें जमीन पर रखना पड़ा। इस प्रकार त्रनावर्त माँ यशोदा की उपस्थिति में कृष्ण को दूर ले जाने में सक्षम हो गया था। लेकिन जब कृष्ण, आकाश में ऊँचा, महिमा-सिद्धि को ग्रहण किया, राक्षस, आगे जाने में असमर्थ, अपनी शक्ति को रोकने और कृष्ण की इच्छा के अनुसार नीचे आने के लिए बाध्य हो गया। इसलिए, व्यक्ति को कृष्ण की रहस्यमय शक्ति से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए।

भक्तों के पास स्वचालित रूप से सभी रहस्यमय शक्ति होती है, लेकिन वे कृष्ण के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहते। इसके बजाय, वे पूरी तरह से कृष्ण के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं, और उनकी योगिक शक्ति कृष्ण की दया से प्रदर्शित होती है। भक्त रहस्यमय योग को इतना शक्तिशाली दिखा सकते हैं कि एक राक्षस इसका सपना भी नहीं देख सकता है, लेकिन वे इसे अपने व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए प्रदर्शित करने का कभी प्रयास नहीं करते। वे जो कुछ भी करते हैं वह भगवान की सेवा के लिए होता है, और इसलिए वे हमेशा राक्षसों की तुलना में श्रेष्ठ स्थिति में होते हैं। ऐसे कई कर्मण, योगी और ज्ञानी हैं जो कृष्ण के साथ कृत्रिम रूप से प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश करते हैं, और इस प्रकार साधारण, मूर्ख लोग जो प्राधिकरणों से श्रीमद-भागवतम् सुनने की परवाह नहीं करते हैं, कुछ बदमाश योगी को भगवान, ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व मानते हैं। वर्तमान समय में अनेक तथाकथित बाबा हैं जो कुछ तुच्छ रहस्यमय आश्चर्य दिखाकर खुद को भगवान के अवतार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, और मूर्ख लोग ज्ञान की कमी के कारण उन्हें भगवान मानते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)