एकदारोहमारूढं लालयन्ती सुतं सती ।
गरिमाणं शिशोर्वोढुं न सेहे गिरिकूटवत् ॥ १८ ॥
अनुवाद
एक दिन, कृष्ण के जन्म के एक वर्ष बाद, माता यशोदा अपने बेटे को गोद में खिला रही थीं। अचानक ही उन्हें लगा कि बच्चा पहाड़ के शिखर से भी ज़्यादा भारी हो गया। वो उसका वज़न सहन नहीं कर पाईं।
One day, a year after Krishna's birth, mother Yashoda was caressing her son in her lap. Suddenly the child seemed heavier than the peak of the mountain and she could not bear his weight.
तात्पर्य
लालयन्ती। कबहूँ माता बालक को उठाए रहती है, तो बालक के हाथ पड़ जाने पर बालक हँसता है और माता भी सुख मानती है। यशोदा जी इसी प्रकार करती थीं, परन्तु इस समय कृष्ण बहुत भारी हो गये, वह उसका भार सह नहीं सकीं। ऐसी दशा में यह समझना पड़ता है कि कृष्ण को त्रणावर्त असुर के आने का भान था जो उनको माता से बहुत दूर ले जाना चाहता है। कृष्ण जानते थे कि जब त्रणावर्त आकर उन्हें उनकी माता की गोदी से ले जायेगा, तब माता यशोदा को बड़ा दुःख होगा। वह नहीं चाहते थे कि उनकी माता दैत्य से किसी प्रकार का दुःख पायें। इसलिए, क्योंकि वह सबके मूल स्रोत हैं (जन्माद्यस्य यतः), उन्होंने सारे संसार के भार को अपने ऊपर ले लिया। बालक तो यशोदा जी की गोदी में था अतः वह सारे संसार को अपनी गोदी में रखने वाली हो गई, परन्तु जब बालक ने उस भारी भार को अपने ऊपर ले लिया, तो उन्हें नीचे रखना पड़ा जिससे त्रणावर्त आसुर को ले जाने और कुछ समय तक उनके साथ खेलने का अवकाश मिल सके और इससे पहले ही उनके माँ की गोदी में वह पधारें।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥