श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 69: नारद मुनि द्वारा द्वारका में भगवान्  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  10.69.45 
यानीह विश्वविलयोद्भववृत्तिहेतु:
कर्माण्यनन्यविषयाणि हरिश्चकार ।
यस्त्वङ्ग गायति श‍ृणोत्यनुमोदते वा
भक्तिर्भवेद् भगवति ह्यपवर्गमार्गे ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान् हरि ही ब्रह्मांड की सृष्टि, पालन और विनाश के सर्वोच्च कारण हैं। हे राजन, जो कोई भी उनके द्वारा इस दुनिया में किए गए अद्वितीय कार्यों का जप करता है, सुनता है या उनकी प्रशंसा करता है, जिनका अनुकरण करना असंभव है, वह निश्चित रूप से मुक्ति देने वाले सर्वोच्च भगवान के प्रति भक्ति उत्पन्न करेगा।
 
Lord Hari is the ultimate cause of the creation, maintenance and destruction of the universe. O King, anyone who sings, listens or simply praises the matchless deeds performed by Him in this world, which are impossible to imitate, will certainly develop devotion to the Lord, the bestower of salvation.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने अनन्य-विषयाणि शब्द के लिए विभिन्न अर्थ दिए हैं। इस शब्द से यह संकेत मिल सकता है कि भगवान ने द्वारका में ऐसी गतिविधियाँ कीं जो कि उनके पूर्ण विस्तारों के लिए भी असामान्य थीं, दूसरों की तो बात ही छोड़ो। या इस शब्द को यह संकेत देने के लिए समझा जा सकता है कि भगवान ने ये गतिविधियाँ अपने शुद्ध, अनन्य भक्तों के लिए कीं। किसी भी मामले में, जो इन लीलाओं का पाठ या श्रवण करता है, वह निश्चित रूप से कृष्ण चेतना में लगा रहेगा और, जैसा कि श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "निश्चित रूप से मुक्ति के मार्ग को पार करना और भगवान कृष्ण के चरण कमलों के अमृत का स्वाद लेना बहुत आसान लगेगा।" श्रील प्रभुपाद और आगे बताते हैं कि यहाँ अनुमोदते शब्द यह इंगित करता है कि जो "कृष्ण चेतना आंदोलन के प्रचारक का समर्थन करता है" को भी यहाँ वर्णित लाभ प्राप्त होंगे।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत उनहत्तर अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)