श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 68: साम्ब का विवाह  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  10.68.24 
अहो महच्चित्रमिदं कालगत्या दुरत्यया ।
आरुरुक्षत्युपानद् वै शिरो मुकुटसेवितम् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
अरे यह कितनी अजीब बात है ! काल रूपी चलती हाथी के जैसी है जो टाले नहीं टलती—अब पैरों की एक जूती भी उस सिर पर चढ़ना चाहती है, जिस पर राज-तिलक का चिह्न सुशोभित है !
 
[The Kuru Nayaks said]: Oh, how strange is this! The passage of time is undoubtedly insurmountable—now a shoe wants to be placed on the head adorned with a crown.
तात्पर्य
काल-गत्यार् दुरुत्यया शब्द से अविवेकी कौरव, कलियुग के निम्न युग की ओर संकेत कर रहे हैं, जो कि शुरू होने वाला था। यहाँ कौरव यह बता रहे हैं कि कलियुग का पतन हो चुका है, क्योंकि वे दावा करते हैं कि अब "जूता उस सिर पर चढ़ना चाहता है जो राजसी ताज धारण करता है"। दूसरे शब्दों में, वे सोचते हैं कि अब नीच यादव राजसी कौरव से उपर उठना चाहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)