श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 67: बलराम द्वारा द्विविद वानर का वध  »  श्लोक 19-21
 
 
श्लोक  10.67.19-21 
मूषलाहतमस्तिष्को विरेजे रक्तधारया ।
गिरिर्यथा गैरिकया प्रहारं नानुचिन्तयन् ॥ १९ ॥
पुनरन्यं समुत्क्षिप्य कृत्वा निष्पत्रमोजसा ।
तेनाहनत् सुसङ्‌क्रु‌द्धस्तं बल: शतधाच्छिनत् ॥ २० ॥
ततोऽन्येन रुषा जघ्ने तं चापि शतधाच्छिनत् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान की गदा के प्रहार से द्विविद की खोपड़ी पर चोट लग गई और रक्त की धार बह निकली। वह उसी तरह सुशोभित हो रहा था जैसे कोई पर्वत लाल मिट्टी से सुंदर लगने लगता है। उसने घाव की परवाह न करके दूसरा वृक्ष उखाड़ा, बलपूर्वक उसकी पत्तियाँ विलग कीं और फिर से भगवान पर प्रहार किया। अब बलराम ने क्रुद्ध होकर उस वृक्ष को सैकड़ों टुकड़ों में तोड़ डाला। इस पर द्विविद ने दूसरा वृक्ष हाथ में लिया और फिर से बहुत ही रोषपूर्वक भगवान पर प्रहार किया। भगवान ने इस वृक्ष के भी सैकड़ों खण्ड कर डाले।
 
Having been hit on the head by the Lord's mace, Dwivid was looking beautiful with the stream of blood flowing from it just as a mountain looks beautiful with ochre. Without caring about the wound, he uprooted another tree, forcefully separated its leaves and again attacked the Lord. Now Balarama got angry and broke the tree into hundreds of pieces. At this Dwivid took another tree in his hand and again attacked the Lord with great anger. The Lord broke this tree into hundreds of pieces as well.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)