श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 66: पौण्ड्रक—छद्म वासुदेव  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  10.66.6 
यानि त्वमस्मच्चिह्नानि मौढ्याद् बिभर्षि सात्वत ।
त्यक्त्वैहि मां त्वं शरणं
नो
चेद् देहि ममाहवम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
हे सात्वत, त्याग दो मेरे निजी चिह्नों को, जिन्हें मूर्खतावश तुम अब धारण करते हो, और मेरी शरण में आ जाओ। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो युद्ध करो मुझसे।
 
O Sattva, give up my personal symbols which you foolishly wear at this time and come and take refuge in me. If you do not do so, then fight with me.
तात्पर्य
श्रील विश्‍वनाथ चक्रवर्ती ने पौंड्रक के शब्दों की फिर से व्याख्या की है सरस्‍वती अर्थात शिक्षा की देवी की प्रेरणा से। इसलिए इन्‍हें इस रूप में समझा जा सकता है कि ''मूर्खतावश मैंने नकली शंख, चक्र, कमल और गदा धारण कर रखी है और आप मुझे इनका उपयोग करने देकर इन्‍हें बनाए रखे हैं। आपने अब तक मुझे वश में नहीं किया है और न ही इन नकली चिन्‍हों से छुटकारा दिलाया है। इसलिए कृपया करके दया करें और मुझे इन्‍हें छोडने पर मजबूर करके मुक्त करें। मेरे साथ युद्ध करें और मुझे मारकर मुक्ति प्रदान करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)