वासुदेवोऽवतीर्णोऽहमेक एव न चापर: ।
भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज ॥ ५ ॥
अनुवाद
[पौण्ड्रक की तरफ से दूत बोला] : मैं ही एकमात्र प्रभु वासुदेव हूँ और कोई दूसरा नहीं है। जीवों पर दया दिखाने के लिए मैं ही इस दुनिया में अवतरित हुआ हूँ। इसलिए तू अपना झूठा नाम छोड़ दे।
[The messenger from Paundraka said] : I am the only Lord Vasudeva and there is no other. I have appeared in this world to show mercy to the living beings. Therefore, give up your false name.
तात्पर्य
देवी सरस्वती से प्रेरित होकर श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इन दो श्लोकों का वास्तविक तात्पर्य बताते हैं: "मैं वासुदेव का अवतार नहीं हूँ, बल्कि वासुदेव तो आप ही हैं, और कोई नहीं। चूँकि आप जीवों पर कृपा करने के लिए अवतरित हुए हैं, इसलिए कृपा करके मुझे अपने झूठे नामकरण को त्यागने दें, जोकि एक सीप के चाँदी होने का दावा करने जैसा है।" सर्वोच्च भगवान निश्चित रूप से इस अनुरोध का पालन करेंगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥