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bhagavat 10.66.32-33: तत्पश्चात् यज्ञकुण्ड से प्रकट हुयी भयंकर अग्नि एक नग्न-धड़ंग पुरुष का रूप धारण कर उठी। इस अग्निमय प्राणी की दाढ़ी तथा केश पिघले हुए ताम्र के समान थे। उसकी आँखों से ज्वलंत अंगारे निकल रहे थे। उसके दाँत और कुटिल भौहें उसके मुख को अत्यंत भयावह बनाती थी। अपनी जीभ से मुँह के कोनों को चाटते हुए यह दानव अपना ज्वलंत त्रिशूल हिला रहा था।   |   bhagavat अध्याय 10.66: पौण्ड्रक—छद्म वासुदेव   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 66: पौण्ड्रक—छद्म वासुदेव  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  10.66.32-33 
ततोऽग्निरुत्थित: कुण्डान्मूर्तिमानतिभीषण: ।
तप्तताम्रशिखाश्मश्रुरङ्गारोद्गारिलोचन: ॥ ३२ ॥
दंष्ट्रोग्रभ्रुकुटीदण्डकठोरास्य: स्वजिह्वया ।
आलिहन् सृक्व‍णी नग्नो विधुन्वंस्‍त्रिशिखं ज्वलत् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् यज्ञकुण्ड से प्रकट हुयी भयंकर अग्नि एक नग्न-धड़ंग पुरुष का रूप धारण कर उठी। इस अग्निमय प्राणी की दाढ़ी तथा केश पिघले हुए ताम्र के समान थे। उसकी आँखों से ज्वलंत अंगारे निकल रहे थे। उसके दाँत और कुटिल भौहें उसके मुख को अत्यंत भयावह बनाती थी। अपनी जीभ से मुँह के कोनों को चाटते हुए यह दानव अपना ज्वलंत त्रिशूल हिला रहा था।
 
Thereafter Agni came out of the sacrificial fire in the form of a very scary naked man. The beard and tuft of this fire-like creature were like molten copper and burning hot embers were coming out of his eyes. His face looked very scary with beards and terrifying crooked and deep eyebrows. This demon was swinging his flaming trident while licking the corners of his mouth with his tongue.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)