राजा के पुत्र सुदक्षिण द्वारा पिता के दाह संस्कार कर्मों को पूरा करने के बाद उसने अपने मन में दृढ़ संकल्प किया: "मैं केवल अपने पिता के हत्यारे को मारकर ही उनकी मृत्यु का बदला ले सकता हूँ।" इस प्रकार दानी सुदक्षिण ने अपने पुरोहितों के साथ मिलकर भगवान महेश्वर की पूजा बड़ी तन्मयता से आरंभ कर दी।
When the king's son Sudakshin had performed the last rites of his father, he decided in his mind, "I can avenge my father's death only by killing his murderer." In this way, the generous Sudakshin, along with his priests, started worshipping Lord Maheshwar with great devotion.
तात्पर्य
श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "काशी नगरी के प्रभु विश्वनाथ (भगवान शिव) है। भगवान विश्वनाथ का मंदिर आज भी वाराणसी में विद्यमान है और अब भी कई हजारो तीर्थ यात्री प्रतिदिन उस मंदिर में एकत्र होते है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥