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bhagavat 10.65.26: [बलराम जी कहते हैं] : मेरा तिरस्कार करने वाली पापिनी! तू मेरे बुलाने पर नहीं आती है और केवल अपनी इच्छानुसार ही चलती है। इसलिए, मैं अपने हल की नोक से सौ धाराओं के रूप में तुम्हें यहाँ खींच लाऊँगा।   |   bhagavat अध्याय 10.65: बलराम का वृन्दावन जाना   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 65: बलराम का वृन्दावन जाना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  10.65.26 
पापे त्वं मामवज्ञाय यन्नायासि मयाहुता ।
नेष्ये त्वां लाङ्गलाग्रेण शतधा कामचारिणीम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
[बलराम जी कहते हैं] : मेरा तिरस्कार करने वाली पापिनी! तू मेरे बुलाने पर नहीं आती है और केवल अपनी इच्छानुसार ही चलती है। इसलिए, मैं अपने हल की नोक से सौ धाराओं के रूप में तुम्हें यहाँ खींच लाऊँगा।
 
[Balram said] : O sinner who disrespects me! You are going to do as you please instead of coming when I call you. Therefore, I will bring you here in the form of a hundred streams with the tip of my plough.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)