श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 65: बलराम का वृन्दावन जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.65.1 
श्रीशुक उवाच
बलभद्र: कुरुश्रेष्ठ भगवान् रथमास्थित: ।
सुहृद्दिद‍ृक्षुरुत्कण्ठ: प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे श्रेष्ठ कुरुओं, एक बार अपने शुभचिंतक मित्रों से मिलने के लिए उत्सुक भगवान बलराम अपने रथ पर सवार हुए और नंद गोकुल की यात्रा की।
 
Sukadeva Goswami said: O best of the Kurus, once Lord Balarama, eager to see His well-wishing friends, mounted His chariot and traveled to Nanda Gokula.
तात्पर्य
जैसा कि श्रील जीव गोस्वामी बताते हैं, श्री वृंदावन की ओर भगवान बलराम की यात्रा का उल्लेख हरिवंश (विष्णु-पर्व 46.10) में भी मिलता है:

कस्यचित्‌ अथ कालस्य

स्मृत्वा गोपेषु सौहृदम्‌

जगाम्‌ एको व्रजं रामः

कृष्णस्यानुमते स्थितः

"एक बार की गौपों के साथ अपनी घनिष्ठ मित्रता को याद कर भगवान राम, भगवान कृष्ण से आज्ञा लेकर अकेले ही व्रज की ओर चले।" वृंदावन के भोले-भाले निवासी इससे बहुत दुखी थे कि भगवान कृष्ण कहीं और रहने चले गए हैं, इसीलिए भगवान बलराम उन्हें सांत्वना देने वहाँ गए थे।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि शुद्ध प्रेम के अपार सागर, भगवान कृष्ण स्वयं व्रज क्यों नहीं गए। व्याख्या में आचार्य ने निम्नलिखित दो पद्य दिए हैं:

प्रेयसीः प्रेम-विख्याताः

पितरौ अति-वत्सलौ

प्रेम-वश्यश्च कृष्णस्‌ तांस्‌

त्यक्त्वा नः कथं एष्यति

इति मत्वा एव यादवाः

प्रत्यबध्नन्‌ हरेश्‌ गतौ

व्रज-प्रेम-प्रवर्धि स्व-

लीलाधीनात्मम्‌ ईयुषः

"यदुओं ने सोचा, 'प्रभु की प्रेयसी अपनी असीम, परमानंदपूर्ण प्रेम के लिए प्रसिद्ध हैं, और उनके माता-पिता उनसे अत्यंत स्नेह करते हैं। भगवान कृष्ण प्रेम के वशीभूत हैं, इसलिए यदि वे उनसे मिलने जाएंगे, तो वे उन्हें छोड़कर हमारे पास कैसे लौट पाएँगे?' इस सोच के साथ, यदुओं ने भगवान हरि को जाने से रोक दिया, यह जानते हुए कि वे उस लीला के अधीन हो जाते हैं जिसमें वे व्रजवासियों के कभी न घटने वाले प्रेम का प्रतिदान करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)