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bhagavat 10.64.37-38: उदारचेता ब्राह्मण जिनके आश्रित परिवार हैं और जिनकी संपत्ति चोरी कर ली गई है, उनके आँसुओं से जितने धूल के कण स्पर्श होते हैं, उन कणों की संख्या जितने वर्षों तक लूटपाट करने वाले अनियंत्रित राजा अपने राज परिवारों के साथ कुम्भीपाक नामक नरक में तड़पते हैं।   |   bhagavat अध्याय 10.64: राजा नृग का उद्धार   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 64: राजा नृग का उद्धार  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  10.64.37-38 
गृह्णन्ति यावत: पांशून् क्रन्दतामश्रुबिन्दव: ।
विप्राणां हृतवृत्तीनां वदान्यानां कुटुम्बिनाम् ॥ ३७ ॥
राजानो राजकुल्याश्‍च तावतोऽब्दान्निरङ्कुशा: ।
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते ब्रह्मदायापहारिण: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
उदारचेता ब्राह्मण जिनके आश्रित परिवार हैं और जिनकी संपत्ति चोरी कर ली गई है, उनके आँसुओं से जितने धूल के कण स्पर्श होते हैं, उन कणों की संख्या जितने वर्षों तक लूटपाट करने वाले अनियंत्रित राजा अपने राज परिवारों के साथ कुम्भीपाक नामक नरक में तड़पते हैं।
 
The unruly kings who usurp the property of a Brahmin, who have families dependent on them and whose property has been usurped, are roasted in the hell called Kumbhipaka for as many years as the number of dust particles touched by the tears of such generous Brahmins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)