स त्वं कथं मम विभोऽक्षिपथ: परात्मा
योगेश्वरै: श्रुतिदृशामलहृद्विभाव्य: ।
साक्षादधोक्षज उरुव्यसनान्धबुद्धे:
स्यान्मेऽनुदृश्य इह यस्य भवापवर्ग: ॥ २६ ॥
अनुवाद
हे महान देव, मैं आपको अपने सामने कैसे देख पा रहा हूँ? आप तो वो परमात्मा हैं जिस पर महान योगियों और ऋषियों द्वारा ही ध्यानावस्था में अपने शुद्ध हृदयों में वेद रूपी ज्ञान के चक्षु के द्वारा ध्यान लगाया जा सकता है। तो हे प्रभु, आप मुझे सीधे कैसे दिखाई दे रहे हैं, जबकि मेरी बुद्धि भौतिक जीवन के कठिन कष्टों से अंधी हो गई है? केवल वही व्यक्ति जो इस दुनिया में अपनी भौतिक उलझनों को समाप्त कर चुका है, उसे आपको देखना चाहिए।
O Vibhu! How am I able to see You in front of me? You are the Supreme Being on whom even the greatest of Yogeshwaras can meditate within their pure hearts only through the divine eye of the Veda. So, O Divine Lord, how are You visible to me since my intellect has been blinded by the severe sufferings of material life? Only one who has destroyed the material bondages of this world can see You.
तात्पर्य
राजा नृग छिपकली के शरीर में भी अपने पिछले जन्म को याद रख सके। और अब जबकि उन्हें भगवान को देखने का अवसर मिला था, वे समझ सके कि उन्हें भगवान का एक विशेष वरदान मिला है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥